Pankh Panchiyo Ke

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बचपन के दिन बड़े सुहाने होते हैं। पंख उगने के, पंख लगाकर उड़ने के। मनुष्य का मन पंछी-सा होता है- कभी यहाँ तो कभी वहाँ। ’आओ मिलकर फूल चूने,’ ’मेरी साइकिल,’ ’मिठ्ठुमियाँ,’ ‘गुणवान बकरी,’ ’पेन की स्याही,’ ’पेड़ रे पेड़’ जैसे नगण्य विषयों पर लिखी हुई कविताएँ बहुत ही सुंदर हैं। ’कछुआ दादा’ की चंद…

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Description

बचपन के दिन बड़े सुहाने होते हैं। पंख उगने के, पंख लगाकर उड़ने के। मनुष्य का मन पंछी-सा होता है- कभी यहाँ तो कभी वहाँ। ’आओ मिलकर फूल चूने,’ ’मेरी साइकिल,’ ’मिठ्ठुमियाँ,’ ‘गुणवान बकरी,’ ’पेन की स्याही,’ ’पेड़ रे पेड़’ जैसे नगण्य विषयों पर लिखी हुई कविताएँ बहुत ही सुंदर हैं। ’कछुआ दादा’ की चंद पंक्तियाँ बालमन का कुतूहल, निरीक्षण आदि को शब्दबद्ध करती दृष्टिगोचर होती हैं- दौड़ में खरगोश मुझ से हारा कछुआ दादा नाम है मेरा । कविता के शीर्षक कितने आकर्षक हैं देखिए- ’बोलनेवाला भुट्टा,’ ’नाचनेवाला भौंरा,’ ’एक थी कली’ जिन्हें पढ़कर कविता को पढ़ने की जिज्ञासा जागृत करती हैै। कविताएँ हैं भी उतनी मन बहलानेवाली बच्चों की दुनिया बड़ी मनमोहक, मनोरंजक और रंगीन होती है; उसी के अनुकूल भाव इन कविताओं में व्यक्त हुए हैं। ’सुन ले हम’ में ध्वनियों की रंजकता, ध्वन्यात्मकता को अनुभव करते है- खड़खड़ाहट, फड़फड़ाहट, घनघनाहट, छनछनाहट, कड़कड़ाहट, गड़गड़ाहट जैसे शब्दोंसे ज्ञान तथा शब्दसंवर्धन होता है। अमीर खुसरों की तरह पहेलियाँ बुझने के लिए लिखी हैं। पहचानो तो सही में, वर्णन किया खूब सारा। पहचानो क्या नाम है मेरा। बच्चों को काफी पसंद आयेगी और मुझे विश्वास है; हिन्दी बालसाहित्य में एकनाथ आव्हाड़ के कवितासंग्रह का जम के स्वागत होगा।

 

डॉ. इरेश सदाशिव स्वामी

प्रथम कुलपती

पुण्यश्लोक अहिल्यादेवी होळकर विद्यापीठ, सोलापूर

Additional information

Weight 0.150 g
Dimensions 15 × 2 × 21 cm
Author

,

Language

ISBN

978-93-94214-73-6

Type

Pages

28

Date of Publishing

22/12/ 2022

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